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भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।
सम्यक्प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥1॥
झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले,
पाप रुपी अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले,
कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार समुन्द्र में डूबते हुए प्राणियों के लिये
आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव के चरण युगल को मन वचन कार्य से
प्रणाम करके (मैं मुनि मानतुंग उनकी स्तुति करुँगा)|
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यःसंस्तुतः सकल-वांग्मय-तत्त्वबोधा-दुद्भूत-बुद्धि-पटुभिः सुरलोक-नाथै ।
स्तोत्रैर्जगत्त्रितय-चित्त-हरै-रुदारैः,स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥2॥
सम्पूर्णश्रुतज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि की कुशलता से
इन्द्रों के द्वारा तीन लोक के मन को हरने वाले,
गंभीर स्तोत्रों के द्वारा जिनकी स्तुति की गई है
उन आदिनाथ जिनेन्द्र की निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी स्तुति करुँगा|
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बुद्धया विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ, स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोहम् ।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-मन्यःक इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥3॥
देवों के द्वारा पूजित हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे जिनेन्द्र मैं बुद्धि
रहित होते हुए भी निर्लज्ज होकर स्तुति करने के लिये
तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल में स्थित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को बालक
को छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य सहसा पकड़ने की इच्छा करेगा? अर्थात् कोई नहीं|
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वक्तुं गुणान् गुण-समुद्र! शशांक-कांतान्, कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोपि बुद्धया ।
कल्पांत-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं, को वा तरीतु-मलमम्बु निधिं भुजाभ्याम् ॥4॥
हे गुणों के भंडार! आपके चन्द्रमा के समान सुन्दर गुणों को कहने
लिये ब्रहस्पति के सद्रश भी कौन पुरुष समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं|
अथवा प्रलयकाल की वायु के द्वारा प्रचण्ड है मगरमच्छों का समूह
जिसमें ऐसे समुद्र को भुजाओं के द्वारा तैरने के लिए कौन समर्थ है अर्थात् कोई नहीं|
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सोहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश, कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृतः ।
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य्य मृगी मृगेन्द्रं, नाभ्येति किं निज-शिशोः परि-पालनार्थम् ॥5॥
हे मुनीश! तथापि-शक्ति रहित होता हुआ भी, मैं- अल्पज्ञ,
भक्तिवश, आपकी स्तुति करने को तैयार हुआ हूँ| हरिणि, अपनी
शक्ति का विचार न कर, प्रीतिवश अपने शिशु की रक्षा के लिये,
क्या सिंह के सामने नहीं जाती? अर्थात जाती हैं|
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अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम, त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चाम्र-चारु-कालिका-निकरैक-हेतु ॥6॥
विद्वानों की हँसी के पात्र, मुझ अल्पज्ञानी को आपकी भक्ति ही
बोलने को विवश करती हैं| बसन्त ऋतु में कोयल जो मधुर शब्द
करती है उसमें निश्चय से आम्र कलिका ही एक मात्र कारण हैं|
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त्वत्संस्तवेन भव-संतति-सन्निबद्धं, पापं क्षणात्क्षय-मुपैति शरीर-भाजाम् ।
आक्रांत-लोक-मलिनील-मशेष-माशु, सूर्यांशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम्॥7॥
आपकी स्तुति से, प्राणियों के, अनेक जन्मों में बाँधे गये
पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं जैसे सम्पूर्ण लोक
में व्याप्त रात्री का अंधकार सूर्य की किरणों
से क्षणभर में छिन्न भिन्न हो जाता है|
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मत्वेति नाथ तव संस्तवनं मयेद-मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् ।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु, मुक्ताफल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दुः ॥8॥
हे स्वामिन्! ऐसा मानकर मुझ मन्दबुद्धि के द्वारा भी आपका यह
स्तवन प्रारम्भ किया जाता है, जो आपके प्रभाव से सज्जनों
के चित्त को हरेगा| निश्चय से पानी की बूँद
कमलिनी के पत्तों पर मोती के समान शोभा को प्राप्त करती हैं|
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आस्तां तव स्तवन-मस्त-समस्त-दोषं, त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हंति ।
दूरे सहस्त्र-किरणः कुरुते प्रभैव, पद्माकरेषु जलजानि विकास-भांजि ॥9॥
सम्पूर्ण दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर,
आपकी पवित्र कथा भी प्राणियों के पापों का नाश कर देती है|
जैसे, सूर्य तो दूर, उसकी प्रभा ही
सरोवर में कमलों को विकसित कर देती है|
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नात्यद्भुतं भुवन-भूषण-भूतनाथ, भूतैर्गुणैर्भुवि भवंत-मभिष्टु-वंतः ।
तुल्या भवंति भवतो ननु तेन किं वा, भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥10॥
हे जगत् के भूषण! हे प्राणियों के नाथ! सत्यगुणों के द्वारा आपकी
स्तुति करने वाले पुरुष पृथ्वी पर यदि आपके समान हो जाते हैं
तो इसमें अधिक आश्चर्य नहीं है| क्योंकि उस स्वामी से क्या प्रयोजन,
जो इस लोक में अपने अधीन पुरुष को सम्पत्ति के द्वारा अपने समान नहीं कर लेता |
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दृष्ट्वा भवंत-मनिमेष-विलोकनीयं, नान्यत्र तोष-मुपयाति जनस्य चक्षुः ।
पीत्वा पयः शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो, क्षारं जलं जलनिधे रसितुँ क इच्छेत् ॥11॥
हे अभिमेष दर्शनीय प्रभो! आपके दर्शन के पश्चात्
मनुष्यों के नेत्र अन्यत्र सन्तोष को प्राप्त नहीं होते|
चन्द्रकीर्ति के समान निर्मल क्षीरसमुद्र के जल को पीकर
कौन पुरुष समुद्र के खारे पानी को पीना चाहेगा? अर्थात् कोई नहीं |
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यैः शांत-राग-रुचिभिः परमाणु-भिस्त्वं, निर्मापितस्त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत ।
तावंत एव खलु तेप्यणवः पृथिव्यां, यत्ते समान-मपरं न हि रूपमस्ति ॥12॥
हे त्रिभुवन के एकमात्र आभुषण जिनेन्द्रदेव! जिन रागरहित
सुन्दर परमाणुओं के द्वारा आपकी रचना हुई वे परमाणु
पृथ्वी पर निश्चय से उतने ही थे क्योंकि आपके समान दूसरा रूप नहीं है |
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वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरगनेत्र-हारि, निःशेष-निर्जित-जगत्त्रित-योपमानम् ।
बिम्बं कलंक-मलिनं क्व निशाकरस्य, यद्वासरे भवति पाण्डु-पलाश-कल्पम् ॥13॥
हे प्रभो! सम्पूर्ण रुप से तीनों जगत् की उपमाओं का विजेता,
देव मनुष्य तथा धरणेन्द्र के नेत्रों को हरने वाला कहां आपका मुख?
और कलंक से मलिन, चन्द्रमा का वह मण्डल कहां?
जो दिन में पलाश (ढाक) के पत्ते के समान फीका पड़ जाता |
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सम्पूर्ण-मण्डल-शशांक-कला कलाप-शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लंग्घयंति ।
ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर-नाथमेकं, कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम ॥14॥
पूर्ण चन्द्र की कलाओं के समान उज्ज्वल आपके गुण,
तीनों लोको में व्याप्त हैं क्योंकि जो अद्वितीय
त्रिजगत् के भी नाथ के आश्रित हैं उन्हें
इच्छानुसार घुमते हुए कौन रोक सकता हैं? कोई नहीं |
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चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि-नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् ।
कल्पांत-काल-मरुता चलिता चलेन, किं मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित् ॥15॥
यदि आपका मन देवागंनाओं के द्वारा किंचित् भी
विक्रति को प्राप्त नहीं कराया जा सका, तो इस विषय में आश्चर्य ही क्या है?
पर्वतों को हिला देने वाली प्रलयकाल की पवन के द्वारा
क्या कभी मेरु का शिखर हिल सका है? नहीं |
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निर्धूम-वर्त्ति-रपवर्जित-तैलपूरः, कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटी-करोषि ।
गम्यो न जातु मरुतां चलिता-चलानां, दीपोपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः ॥16॥
हे स्वामिन्! आप धूम तथा बाती से रहित, तेल के प्रवाह के बिना भी
इस सम्पूर्ण लोक को प्रकट करने वाले अपूर्व जगत्
प्रकाशक दीपक हैं जिसे पर्वतों को हिला देने
वाली वायु भी कभी बुझा नहीं सकती |
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नास्तं कदाचिदुपयासि न राहु-गम्यः, स्पष्टी-करोषि सहसा युगपज्जगंति ।
नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभावः, सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र लोके ॥17॥
हे मुनीन्द्र! आप न तो कभी अस्त होते हैं न ही राहु के द्वारा ग्रसे जाते हैं
और न आपका महान तेज मेघ से तिरोहित होता है
आप एक साथ तीनों लोकों को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं
अतः आप सूर्य से भी अधिक महिमावन्त हैं |
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नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं। गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम् ।
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्प-कांति, विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशांक-विम्बम् ॥18॥
हमेशा उदित रहने वाला, मोहरुपी अंधकार को नष्ट करने वाला
जिसे न तो राहु ग्रस सकता है, न ही मेघ आच्छादित कर सकते हैं,
अत्यधिक कान्तिमान, जगत को प्रकाशित करने वाला
आपका मुखकमल रुप अपूर्व चन्द्रमण्डल शोभित होता है |
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किं शर्वरीषु शशिनान्हि विवस्वता वा, युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमःसु नाथ ।
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके, कार्यं कियज्-जलधरैर्जल-भारनम्रैः ॥19॥
हे स्वामिन्! जब अंधकार आपके मुख रुपी चन्द्रमा के द्वारा
नष्ट हो जाता है तो रात्रि में चन्द्रमा से एवं दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन?
पके हुए धान्य के खेतों से शोभायमान धरती तल पर
पानी के भार से झुके हुए मेघों से फिर क्या प्रयोजन |
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ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं, नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु ।
तेजःस्फुरन्मणिषु याति यथा महत्वं, नैवं तु काच-शकले किरणा-कुलेपि ॥20॥
अवकाश को प्राप्त ज्ञान जिस प्रकार आप में शोभित होता है
वैसा विष्णु महेश आदि देवों में नहीं | कान्तिमान मणियों में,
तेज जैसे महत्व को प्राप्त होता है वैसे
किरणों से व्याप्त भी काँच के टुकड़े में नहीं होता |
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मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा, दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति ।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः, कश्चिन्मनो हरति नाथ भवांतरेपि ॥21॥
हे स्वामिन्| देखे गये विष्णु महादेव ही मैं उत्तम मानता हूँ,
जिन्हें देख लेने पर मन आपमें सन्तोष को प्राप्त करता है|
किन्तु आपको देखने से क्या लाभ? जिससे कि प्रथ्वी पर
कोई दूसरा देव जन्मान्तर में भी चित्त को नहीं हर पाता |
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स्त्रीणां शतानि शतशो जनयंति पुत्रान्-नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्त्र-रश्मिं, प्राच्येव दिग्जनयति स्फुर-दंशु-जालम् ॥22॥
सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, परन्तु आप जैसे
पुत्र को दूसरी माँ उत्पन्न नहीं कर सकी| नक्षत्रों को सभी दिशायें
धारण करती हैं परन्तु कान्तिमान् किरण समूह से
युक्त सूर्य को पूर्व दिशा ही जन्म देती हैं |
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त्वामा-मनंति मुनयः परमं पुमांस-मादित्य-वर्ण-ममलं तमसः पुरस्तात्
त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयंति मृत्युं, नान्यः शिवः शिव-पदस्य मुनीन्द्र पंथाः ॥23॥
हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन आपको सूर्य की तरह तेजस्वी निर्मल
और मोहान्धकार से परे रहने वाले परम पुरुष मानते हैं |
वे आपको ही अच्छी तरह से प्राप्त कर म्रत्यु को जीतते हैं |
इसके सिवाय मोक्षपद का दूसरा अच्छा रास्ता नहीं है|
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त्वा-मव्ययं विभु-मचिंत्य-मसंखय-माद्यं, ब्रह्माण-मीश्वर-मनंत-मनंग केतुम् ।
योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं, ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदंति संतः ॥24॥
सज्जन पुरुष आपको शाश्वत, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आद्य,
ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु, योगीश्वर, विदितयोग,
अनेक, एक ज्ञानस्वरुप और अमल कहते हैं |
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बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्, त्त्वं शंकरोसि भुवन-त्रय-शंकरत्वात् ।
धातासि धीर! शिव-मार्ग-विधेर्-विधानात्, व्यक्तं त्वमेव भगवन्! पुरुषोत्तमोसि ॥25॥
देव अथवा विद्वानों के द्वारा पूजित ज्ञान वाले होने से आप ही बुद्ध हैं|
तीनों लोकों में शान्ति करने के कारण आप ही शंकर हैं|
हे धीर! मोक्षमार्ग की विधि के करने वाले होने से आप ही ब्रह्मा हैं|
और हे स्वामिन्! आप ही स्पष्ट रुप से मनुष्यों में उत्तम अथवा नारायण हैं |
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तुभ्यं नम स्त्रिभुवनार्ति-हाराय नाथ, तुभ्यं नमः क्षिति-तलामल-भूषणाय ।
तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय ॥26॥
हे स्वामिन्! तीनों लोकों के दुःख को हरने वाले आपको नमस्कार हो,
प्रथ्वीतल के निर्मल आभुषण स्वरुप आपको नमस्कार हो,
तीनों जगत् के परमेश्वर आपको नमस्कार हो और
संसार समुन्द्र को सुखा देने वाले आपको नमस्कार हो|
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को विस्मयोत्र यदि नाम गुणैरशेषै, स्त्वं संश्रितो निरवकाश-तया मुनीश ।
दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वैः, स्वप्नांतरेपि न कदाचिद-पीक्षितोसि ॥27।।
हे मुनीश! अन्यत्र स्थान न मिलने के कारण समस्त गुणों ने
यदि आपका आश्रय लिया हो तो तथा अन्यत्र अनेक आधारों को
प्राप्त होने से अहंकार को प्राप्त दोषों ने कभी स्वप्न में
भी आपको न देखा हो तो इसमें क्या आश्चर्य?
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उच्चैर-शोक-तरु-संश्रित-मुन्मयूख-माभाति रूप-ममलं भवतो नितांतम् ।
स्पष्टोल्लसत-किरणमस्त-तमोवितानं, बिम्बं रवेरिव पयोधर-पार्श्ववर्ति ॥28॥
ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे स्थित, उन्नत किरणों वाला,
आपका उज्ज्वल रुप जो स्पष्ट रुप से शोभायमान किरणों से युक्त है,
अंधकार समूह के नाशक, मेघों के निकट स्थित सूर्य
बिम्ब की तरह अत्यन्त शोभित होता है |
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सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे, विभाजते तव वपुः कानका-वदातम ।
बिम्बं वियद्-विलस-दंशु-लता-वितानं, तुंगोदयाद्रि-शिरसीव सहस्त्र-रश्मेः ॥29॥
मणियों की किरण-ज्योति से सुशोभित सिंहासन पर,
आपका सुवर्ण कि तरह उज्ज्वल शरीर, उदयाचल के उच्च शिखर पर
आकाश में शोभित, किरण रुप लताओं के समूह वाले
सूर्य मण्डल की तरह शोभायमान हो रहा है|
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कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं, विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कांतम् ।
उद्यच्छशांक-शुचि-निर्झर-वारि-धार-मुच्चैस्तटं सुर-गिरेरिव शात-कौम्भम् ॥30॥
कुन्द के पुष्प के समान धवल चँवरों के द्वारा सुन्दर है शोभा जिसकी,
ऐसा आपका स्वर्ण के समान सुन्दर शरीर, सुमेरुपर्वत,
जिस पर चन्द्रमा के समान उज्ज्वल झरने के जल की धारा बह रही है,
के स्वर्ण निर्मित ऊँचे तट की तरह शोभायमान हो रहा है|
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छत्र-त्रयं तव विभाति शशांक-कांत-मुच्चैः स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम् ।
मुक्ता-फल-प्रकर-जाल-विवृद्ध-शोभं, प्रख्यापयत्-त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥31॥
चन्द्रमा के समान सुन्दर, सूर्य की किरणों के सन्ताप को रोकने वाले,
तथा मोतियों के समूहों से बढ़ती हुई शोभा को धारण करने वाले,
आपके ऊपर स्थित तीन छत्र, मानो आपके
तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं|
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गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्वभाग-स्त्रैलोक्य-लोक-शुभ-संगम-भूति-दक्षः ।
सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषकः सन्, खे दुन्दुभिर्-ध्वनति ते यशसः प्रवादि ॥32॥
गम्भीर और उच्च शब्द से दिशाओं को गुञ्जायमान करने वाला,
तीन लोक के जीवों को शुभ विभूति प्राप्त कराने में समर्थ
और समीचीन जैन धर्म के स्वामी की जय घोषणा करने वाला
दुन्दुभि वाद्य आपके यश का गान करता हुआ आकाश में शब्द करता है|
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मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात, संतानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टिरुद्धा ।
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता, दिव्या दिवः पतति ते वयसां ततिर्वा ॥33॥
सुगंधित जल बिन्दुओं और मन्द सुगन्धित वायु के साथ गिरने वाले
श्रेष्ठ मनोहर मन्दार, सुन्दर, नमेरु, पारिजात, सन्तानक आदि
कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आपके वचनों की
पंक्तियों की तरह आकाश से होती है|
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शुम्भत्प्रभा-वलय-भूरि-विभा विभोस्ते, लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिमा-क्षिपंती ।
प्रोद्यद्दिवाकर्-निरंतर-भूरि-संख्या, दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोम-सौम्याम् ॥34॥
हे प्रभो! तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की प्रभा को
तिरस्कृत करती हुई आपके मनोहर भामण्डल की विशाल कान्ति
एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कान्ति से युक्त होकर भी
चन्द्रमा से शोभित रात्रि को भी जीत रही है|
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स्वर्गा-पवर्ग-गममार्ग-विमार्गणेष्टः, सद्धर्म-तत्त्व-कथनैक-पटुस-त्रिलोक्याः ।
दिव्य-ध्वनिर-भवति ते विशदार्थ-सर्व-भाषा-स्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः ॥35॥
आपकी दिव्यध्वनि स्वर्ग और मोक्षमार्ग की खोज में साधक,
तीन लोक के जीवों को समीचीन धर्म का कथन करने में समर्थ,
स्पष्ट अर्थ वाली, समस्त भाषाओं में परिवर्तित
करने वाले स्वाभाविक गुण से सहित होती है|
***
उन्निद्र-हेम-नवपंकजपुंज-कांती, पर्युल्लसन्नख-मयूख-शिखा-भिरामौ ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्तः, पद्मानि तत्र विबुधाः परि-कल्पयंति ॥36॥
पुष्पित नव स्वर्ण कमलों के समान शोभायमान नखों की
किरण प्रभा से सुन्दर आपके चरण जहाँ पड़ते हैं
वहाँ देव गण स्वर्ण कमल रच देते हैं|
***
इत्थं यथा तव विभूति-रभूज्जिनेन्द्र, धर्मोप-देशन विधौ न तथा परस्य ।
यादृक् प्रभा देनकृतः प्रहतान्ध-कारा, तादृक्कुतो ग्रह-गणस्य विकासिनोपि ॥37॥
हे जिनेन्द्र! इस प्रकार धर्मोपदेश के कार्य में जैसा आपका
ऐश्वर्य था वैसा अन्य किसी का नही हुआ| अंधकार को नष्ट करने
वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी अन्य
प्रकाशमान भी ग्रहों की कैसे हो सकती है?
***
श्च्योतन-मदा-विल-विलोल-कपोल-मूल-मत्त-भ्रमद-भ्रमर-नाद विवृद्ध-कोपम् ।
ऐरावताभ-मिभ-मुद्धत-मापतंतं, दृष्टवा भयं भवति नो भवदा-श्रितानाम् ॥38॥
आपके आश्रित मनुष्यों को, झरते हुए मद जल से जिसके
गण्डस्थल मलीन, कलुषित तथा चंचल हो रहे है और उन पर
उन्मत्त होकर मंडराते हुए काले रंग के भौरे अपने गुजंन से क्रोध बढा़ रहे हों
ऐसे ऐरावत की तरह उद्दण्ड, सामने आते हुए हाथी को देखकर भी भय नहीं होता|
***
भिन्नेभ-कुम्भ-गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त-मुक्ताफल-प्रकर-भूषित-भूमिभागः ।
बद्ध-क्रमः क्रम-गतं हरिणा-धिपोपि, नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते ॥39॥
सिंह, जिसने हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण कर,
गिरते हुए उज्ज्वल तथा रक्तमिश्रित गजमुक्ताओं से पृथ्वी तल को
विभूषित कर दिया है तथा जो छलांग मारने के लिये तैयार है
वह भी अपने पैरों के पास आये हुए ऐसे पुरुष पर आक्रमण नहीं करता
जिसने आपके चरण युगल रुप पर्वत का आश्रय ले रखा है|
***
कल्पांत-काल-पवनोद्धत-वह्नि-कल्पं, दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिंगम् ।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतंतं, त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्य-शेषम् ॥40॥
आपके नाम यशोगानरुपी जल, प्रलयकाल की वायु से उद्धत,
प्रचण्ड अग्नि के समान प्रज्वलित, उज्ज्वल चिनगारियों से युक्त,
संसार को भक्षण करने की इच्छा रखने वाले की तरह सामने आती हुई
वन की अग्नि को पूर्ण रुप से बुझा देता है|
***
रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलं, क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतंतम् ।
आक्रामति क्रमयुगेन निरस्त-शंकस्-त्वन्नाम-नाग-दमनी हृदि यस्य पुंस ॥41॥
जिस पुरुष के ह्रदय में नामरुपी-नागदौन नामक औषध मौजूद है,
वह पुरुष लाल लाल आँखो वाले, मदयुक्त कोयल के कण्ठ की तरह काले,
क्रोध से उद्धत और ऊपर को फण उठाये हुए,
सामने आते हुए सर्प को निश्शंक होकर दोनों पैरो से लाँघ जाता है|
***
वल्गत्तुरंग-गज-गर्जित-भीम-नाद-माजौ बलं बलवतामपि भू-पतीनाम् ।
उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखा-पविद्धं, त्वत्कीर्त्तनात्-तम इवाशु भिदा-मुपैति ॥42॥
आपके यशोगान से युद्धक्षेत्र में उछलते हुए घोडे़ और हाथियों की गर्जना से
उत्पन भयंकर कोलाहल से युक्त पराक्रमी राजाओं की भी सेना,
उगते हुए सूर्य किरणों की शिखा से वेधे गये
अंधकार की तरह शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाती है|
***
कुंताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह-वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे ।
युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-त्वत्-पाद-पंकज-वना-श्रयिणो लभंते ॥43॥
हे भगवन् आपके चरण कमलरुप वन का सहारा लेने वाले पुरुष,
भालों की नोकों से छेद गये हाथियों के रक्त रुप जल प्रवाह में पडे़ हुए,
तथा उसे तैरने के लिये आतुर हुए योद्धाओं से भयानक युद्ध में,
दुर्जय शत्रु पक्ष को भी जीत लेते हैं|
***
अम्भो-निधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ ।
रंगत्तरंग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद्-व्रजंति ॥44॥
क्षोभ को प्राप्त भयंकर मगरमच्छों के समूह और मछलियों के द्वारा
भयभीत करने वाले दावानल से युक्त समुद्र में विकराल लहरों के
शिखर पर स्थित है जहाज जिनका, ऐसे मनुष्य,
आपके स्मरण मात्र से भय छोड़कर पार हो जाते हैं|
***
उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्नाः, शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशाः ।
त्वत्पाद-पंकज-रजोमृतदिग्ध-देहाः, मर्त्या भवंति मकर-ध्वज-तुल्य-रूपाः ॥45॥
उत्पन्न हुए भीषण जलोदर रोग के भार से झुके हुए,
शोभनीय अवस्था को प्राप्त और नहीं रही है जीवन की आशा जिनके,
ऐसे मनुष्य आपके चरण कमलों की रज रुप अम्रत से लिप्त
शरीर होते हुए कामदेव के समान रुप वाले हो जाते हैं|
***
आपाद-कण्ठ-मुरुशृंखल-वेष्टितांगा, गाढं बृहन्निगड-कोटि-निघृष्ट-जंघाः ।
त्वन्नाम-मंत्र-मनिशं मनुजाः स्मरंतः, सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवंति ॥46॥
जिनका शरीर पैर से लेकर कण्ठ पर्यन्त बडी़-बडी़ सांकलों से जकडा़ हुआ है
और विकट सघन बेड़ियों से जिनकी जंघायें अत्यन्त छिल गईं हैं
ऐसे मनुष्य निरन्तर आपके नाममंत्र को स्मरण
करते हुए शीघ्र ही बन्धन मुक्त हो जाते है|
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मत्त-द्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि-संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्धनोत्थम् ।
तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव, यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमान-धीते ॥47॥
जो बुद्धिमान मनुष्य आपके इस स्तवन को पढ़ता है
उसका मत्त हाथी, सिंह, दवानल, युद्ध, समुद्र
जलोदर रोग और बन्धन आदि से उत्पन्न भय मानो
डरकर शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाता है|
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स्तोत्र-स्त्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्-निबद्धां, भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम् ।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गतामजसं, तं मानतुंगमवश समुपैति लक्ष्मीः ॥48॥
हे जिनेन्द्र देव! इस जगत् में जो लोग मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक (ओज, प्रसाद, माधुर्य आदि)
गुणों से रची गई नाना अक्षर रुप, रंग बिरंगे फूलों से युक्त आपकी
स्तुति रुप माला को कंठाग्र करता है उस उन्नत सम्मान वाले पुरुष को
अथवा आचार्य मानतुंग को स्वर्ग मोक्षादि की विभूति अवश्य प्राप्त होती है|
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